रात सुहानी ढलते ढलते सबकुछ देके जाती है बदनामीसे डरनेवालो रोज सुबह फिर आती है जितना पाया देकर जावो पुरखोने ये रीत सिखायी बरस बरसकर बरखा रानी यही हमेशा गाती है अंदर बाहर साफ साफ दिल मुझमे रहने आया है दीपकमे है कुआ तेलका कभी न बुझती वाती है शरद चांदनी शुभ्र कमलिनी मीराका मन…