प्रीतकी जंजीर हो या अभिमानका खंजर,
भाषा ब्रह्मांडकी हो या पिंडकी,
धर्म जागतिक हो या राष्ट्रका या देशका या प्रादेशिक,
हृदयका धर्म होता है प्रेम..
प्रेमही अहिंसा है और वो अपनी आत्माका स्वभाव है.
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ग़ज़ल .. दिलका नारा
जै जिनेंद्र जय दिलका नारा
जिनवानी की पावन धारा
वर्तमान तीर्थंकर अंतिम
महावीर जिन हमको प्यारा
मुनी दिगंबर पिंछी धारी
सिद्ध शिला पर बिंदू तारा
जीत लिया दिल हर जीवोंका
जिन बनके ना खुदसे हारा
पंच परम पद परमेष्ठी के
जिनायतन है ग्राम हमारा